आपदा में भ्रांतियां या सच – देवदार का पेड़

आपदा में भ्रांतियां या सच – देवदार का पेड
जीवन में पेड़ों का महत्व कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जलवायु का संतुलन इन्हीं पर टिका है। उत्तराखंड में जंगलों और पेड़ों की अहमियत केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी विशेष रही है। मैदानी इलाकों में जिस तरह पीपल और बरगद को पवित्र माना जाता है, वैसे ही पहाड़ों पर देवदार को देवतुल्य स्थान मिला है।
उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति और आस्था प्रकृति से गहराई से जुड़ी रही है। यहां के लोग देवदार (देवदारु) को सदैव पवित्र और देवता स्वरूप मानते आए हैं। धार्मिक मान्यता में इसका नाम ही “देव का वृक्ष” बताता है। लोकमान्यता रही है कि इसमें देवताओं का वास होता है। यही कारण है कि प्राचीन काल में देवदार की लकड़ी का प्रयोग मंदिर निर्माण और पूजा स्थलों में किया जाता था, क्योंकि इसे शुभ, टिकाऊ और पवित्र माना जाता था।
देवदार केवल आस्था का प्रतीक ही नहीं था, बल्कि पहाड़ों की सुरक्षा का भी प्रहरी रहा। यह भूस्खलन को रोकने और धरती को मजबूती देने में अपनी अहम भूमिका निभाता था। किंतु आज जब हम उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा को देखते हैं, तो दो बातें सामने आती हैं।
पहली— अपने देवतुल्य वृक्षों का अंधाधुंध विनाश, जिसका परिणाम हमें विनाशकारी आपदाओं के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
दूसरी— लाखों पेड़ों की कटाई से कमजोर होते पहाड़, जो हर बारिश और भूचाल में मौत के मलबे में बदल जाते हैं।
लोकगीतों और लोककथाओं में देवदार को ऊँचाई, पवित्रता और सुरक्षा का प्रतीक बताया गया है। गांवों में लोग इसे छेड़ना अशुभ मानते थे, मानो किसी देवस्थान का अपमान कर रहे हों।
संक्षेप में, देवदार केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि आस्था, औषधि और पर्यावरण का रक्षक रहा है। आज की पीढ़ी भले ही इसे अंधविश्वास या भ्रांति माने, लेकिन पुरानी पीढ़ी ने सदा माना कि वृक्षों में भगवान का वास होता है। शायद यही कारण है कि आज जब हम जीवन को सुखद बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, तभी हमारा अस्तित्व धीरे-धीरे “गर्क” की ओर बढ़ रहा है।



